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लोकतंत्र और न्याय की देवी की हताशा-निराशा तथा प्रारब्ध की जीत

साहित्य

लोकतंत्र और न्याय की देवी की हताशा-निराशा तथा प्रारब्ध की जीत

साहित्य/व्यंग्य लेख/Madhya Pradesh/Indore :

सुप्रसिद्ध चिकित्सक और ख्यात शल्य चिकित्सक भारतभूषण डॉ. विक्रमादित्य ने रात बारह बजे अपनी अन्तिम शल्य चिकित्सा निपटाई और सदियों से श्मशान के पास छाती तान कर खड़े विशाल वृक्ष पर चढ़कर आनन-फानन में सोए हुए बेताल को अपने कन्धे पे डाला और घने वन की ओर प्रस्थान कर दिया I

बेताल कुछ दिनों से विक्रम का दासत्व स्वीकार करने के लिए विवश हो चुका, इसलिए विक्रम ने बेताल से कहा सुन बेताल ! मेरे कुछ प्रश्नों के सही-सही उत्तर दे देगा तो मैं तुझे कुछ महीनों के लिए स्वतंत्र कर दूंगा I

बेताल – पूछ विक्रम ! मैं जानता हूँ कि कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है, कहते हैं कि कर्मों की गति टारे नहीं टरती है I पहले मैं तुझसे प्रश्न पूछता था, अब विधि के विधान ने स्थितियां उलट दी हैं और स्वीकारने के अतिरिक्त मेरे पास और कोई विकल्प है भी नहीं I

विक्रम –बेताल ! ये बता कि पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न स्व. श्री राजीव गांधी की कौन-सी स्वीकारोक्ति को वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी बार-बार उपयोग में लाते हैं और क्यों?

बेताल- विक्रम ! संयोगवश राजनीति में आए श्री राजीव गांधी की भ्रष्टाचार को रोकने की बहुत मंशा थी, परन्तु वे असफल रहे थे I जिसकी उन्हें बहुत पीड़ा थी, इसलिए अत्यधिक व्यथा के साथ स्वीकार किया था कि हम एक रुपया भेजते हैं परन्तु लाभार्थी को मात्र 15 पैसे ही मिल पाते है I विक्रम ! भ्रष्टाचार भारत की रग-रग में शिष्टाचार के रूप में दौड़ रहा है, परन्तु श्री राजीवजी के वक्तव्य के कारण इस विश्वव्यापी भ्रष्टाचार को कांग्रेसी सत्ता से जोड़ दिया गया है I चूँकि मोदीजी ने लाभार्थी तक धन पहुँचाने का उपाय बदल दिया है, इसलिए पूरा एक रुपया लाभार्थियों तक पहुँच जाता है I अपनी इस सफलता को वे राजीवजी की असफलता से तुलना कर भाजपा सरकार की उपलब्धि दर्शाने के लिए बार-बार उसका उल्लेख करते हैं I

विक्रम –बेताल ! क्या मोदीजी के बयान का अर्थ यह है कि भारत से भ्रष्टाचार जड़मूल से समाप्त हो गया है I

बेताल ठहाके मार-मार कर कोर-जोर से हंसने लगा, रात के नीरव वातावरण में बेताल की भयानक अट्टहास को सुनकर शेर जैसे हिंसक पशुओं सहित सभी पशु- पक्षी जाग कर इधर-उधर भागने लगे I वह देर तक हँसता रहा I

विक्रम ने तलवार खींचीं और आक्रमण की मुद्रा में आ गया और बेताल को अपंग करने वाला इंजेक्शन भी हाथ में ले लिया और बोला – बेताल ! इसमें हंसने की क्या बात है?

बेताल- विक्रम ! भ्रष्टाचार नामक महाराक्षस का सौ-सौ नरेन्द्र मोदी की सौ टोलियाँ भी वध नहीं कर सकती हैं, वह तो कालजयी हो चुका है I मैं तुझे दिव्य नेत्र देता हूँ, हर सरकारी कार्यालयों के दृश्य दिखा देता हूँ, रिश्वत का व्यापार भारत की जनसंख्या की तरह नियंत्रण के अभाव में निर्बाध रूप से फलफूल रहा है I यह भी जनमानस में व्याप्त है कि नोटबंदी से हुए नुकसान की भरपाई के चलते सरकारी तंत्र में रिश्वत के भाव कई गुना बढ़ चुके हैं I विक्रम ने कुछ ही देर में हजारों सरकारी कार्यालयों में चल रहे शिष्टाचार को साक्षी भाव से देखा और दुखी होकर बोला–बेताल ! भारत में तो लोकतंत्र है और उसके चार सशक्त खम्भे भी हैं, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और सब पर तीक्ष्ण दृष्टि रखने वाला चौथा खम्भा, पत्रकारिता तो बहुत ही सशक्त है I फिर भी ऐसा क्यों हो रहा है?

बेताल – विक्रम ! नागरिकों की सेवा-सुविधा के लिए, नागरिकों के करों से प्राप्त राजस्व के आधार पर सवैतनिक रूप से पदस्थ जनसेवक, व्यवस्था के तहत प्राप्त कर्तव्यों और दायित्वों की शक्तियों को व्यक्तिगत शक्ति मानकर स्वामित्व भाव और अहंकार को धारण कर लें तो भ्रष्टाचार शिष्टाचार में बदल कर निर्भीकतापूर्वक लालच का पेट भरने लगता है I विक्रम ! स्थितियां निर्लज्जता की सीमाओं को लांघ चुकी है I हर प्रदेश में अनेक प्रकरण मिल जाएंगे, जिनमें चौथे खम्भे की अत्यधिक जागरूकता भी प्रभावहीन सिद्ध हुई है I यहाँ तक कि दर्जनों प्रकरण ऐसे भी है, जिनमें न्यायपालिका के निर्णयों और यहाँ तक कि अवमानना याचिका के उपरान्त भी उच्च न्यायालय तक के निर्णयों का पालन ही नहीं हुए हैं I हर प्रदेश के सरकारी कार्यालयों में कितनी अवमानना याचिकाएं लम्बित है, यह न्यायपालिका को दर्पण दिखाने की दृष्टि से एक नए शोध का आधार बन सकता है I

विक्रम –बेताल ! मुझे तेरी बात कपोल कल्पित लग रही है I यह असम्भव है I अभी सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया और श्री राहुल गांधी को संसद की सदस्यता तत्काल प्रभाव से पुन: प्रदान कर दी गई I

बेताल- विक्रम ! श्री राहुल गांधी अति-अति विशिष्ट नागरिक हैं I सामान्य नागरिकों को लोकतंत्र में निकृष्ट श्रेणी का उपेक्षणीय प्राणी माना जाता है l तुझे विश्वास नहीं है तो एक ज्वलंत उदाहरण बताता हूँ, उच्च न्यायालय, इन्दौर में प्रस्तुत याचिका क्रमांक 14746/2019 का निर्णय 31.07.2019 को हो गया था, निर्णय का पालन नहीं हुआ तो अवमानना पूर्व सूचना पत्र भेजा गया, फिर भी कुछ नहीं हुआ तो जनवरी 2020 में अवमानना याचिका लगाई I फिर उसकी भी उपेक्षा हुई तो कुछ अन्य प्रयास किए, जून 2021 को शासन ने राज्यपाल के आदेशानुसार एक आदेश निकाला I पता नहीं क्या-क्या हुआ और उस आदेश का वास्तविक लाभ आज चार वर्ष बीत जाने पर भी नहीं मिला है I इस आदेश में उसे अप्रैल 2006 से लाभ देय था, इस दृष्टि से तो बेचारा वह नागरिक पूरे 17 वर्ष से बस प्रतीक्षा ही कर रहा है I

विक्रम – बेताल ! वह व्यक्ति अति साधारण, निरक्षर और ग्रामीण होगा I

बेताल – विक्रम ! वह उच्च शिक्षित तथा मध्य प्रदेश सरकार का प्रथम श्रेणी राजपत्रित अधिकारी है, अति जागरूक व्यक्ति है, उसने अपने विभाग प्रमुख के विरुद्ध विशेष स्थापना पुलिस में सत्य बयानी की थी I अपने विद्यार्थियों के हितार्थ मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री आदि को पत्र लिखने से नहीं डरा I उसके कारण आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय ने चिकित्सा विद्यार्थियों को हिन्दी मिश्रित अंगरेजी में उत्तर लिखने, शोध प्रबन्धों को डिजिटल स्वरूप में प्रस्तुत करने की अनुमति प्रदान करवाई, साथ ही भारतीय चिकित्सा परिषद् आदि ने अपने नियमों में ऐतिहासिक परिवर्तन किए हैं I अवमानना के उपरान्त भी उसको लाभ नहीं मिला तो उसने महामहिम राष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय, प्रधानमंत्री, न्याय और विधि मंत्री को पत्र भी लिखें I परन्तु निराशा ही हाथ लगी है I अन्याय के विरुद्ध वह तीन-चार बार उच्च न्यायालय जा चुका है I सूचना अधिकार अधिनियम के तहत वह दो बार मुख्य सूचना आयुक्त तक भी पहुंचा, हालांकि व्यवस्था द्वारा दी गई असत्य जानकारी से उसे संतोष करना पड़ा, बेचारा कितना लड़ता?

विक्रम – बेताल ! हताशा और निराशा की पराकाष्ठा की स्थिति में क्या वह अवसाद से तो ग्रस्त नहीं हो गया था?

बेताल – विक्रम ! नहीं, वह वर्षों से श्रीरामचरितमानस का पारायण करता रहा है, साथ ही वह कई दशकों से भगवान श्रीकृष्ण और राम में विश्वास करता रहा है, परन्तु अपनी परमात्मा द्वारा प्रदत्त सफलताओं और लेखनी के दंभ के चलते वह भूल गया था कि होइहि सोइ जो राम रचि राखा ही सनातन सत्य है I इसलिए अहंकारिता में उसने बहुत हाथ पैर मारें, लगातार वर्षों तक विविध आयामी प्रयास करता ही रहा I विधायिका और पत्रकारिता से निकटता का बड़ा दम्भ हो गया था और न्यायपालिका का भी I परन्तु अब उसे यह अनुभूति स्पष्ट रूप से हो गई है कि लोकतंत्र के खम्भे तो केवल आभासी हैं I प्रारब्ध ही सर्वशक्तिमान है, इसलिए आजकल श्रीमद्भागवत गीता के कर्मण्येवाधिकारस्ते पर विश्वास कर प्रारब्ध को स्वीकारने लगा है I

विक्रम – बेताल ! अर्थात् मेरा राजतंत्र इस लोकतंत्र से करोड़ों गुना अच्छा था I अच्छा ये बता कि सामान्य नागरिकों को सहजतापूर्वक और यथासमय न्याय प्राप्ति के लिए क्या सहज-सरल, सर्वमान्य समाधान हो सकता है?

बेताल- विक्रम ! मोदीजी की सरकार लोकसभा और राज्यसभा में एक बिल प्रस्तुत करें कि उनकी सरकार स्व. श्री राजीवजी गांधी को सच्ची श्रद्धांजलि देने हेतु तथा सामान्य नागरिकों के सकल हितों का ध्यान रखते हुए और सर्वजन सुखाय-सर्वजन सुखाय के पावन उद्देश्य से रिश्वत का नाम बदल कर शिष्टाचार निधि रखना चाहती है I हरेक विभाग के हरेक कार्य की शिष्टाचार निधि सुनिश्चित रहेगी, उसमें एक पाई का भी परिवर्तन नहीं होगा I यह सूची सभी स्थानों, समाचार पत्रों और इंटरनेट पर भी सहजता से उपलब्ध रहेगी I इस निधि को डिजिटली जमा किया जा सकेगा I

विक्रम- [टोकते हुए] –बेताल ! क्या विपक्ष इसका समर्थन करेगा? क्या सामान्य नागरिक इसे स्वीकार करेंगे?

बेताल – विक्रम ! निश्चिन्त रहो, सभी प्रसन्न होंगे I नागरिक सर्वाधिक प्रसन्न होंगे क्योंकि वर्षों तक भटकने, न्यायपालिका की शरण में जाने, हजारों रुपए निवेश करने, हड़ताल-धरना देने के उपरान्त भी उनके संवैधानिक काम नहीं होते हैं, उससे बहुत कम राशि में उनका काम हो जाएगा, वैसे भी कुछ दशकों से सामान्य नागरिक संवैधानिक काम होने पर प्रसन्नतापूर्वक स्वत: ही नगद के साथ-साथ मिठाई आदि सम्बन्धित शासकीय सेवकों को देते ही हैं I विपक्ष को भी उस राशि में से निश्चित अनुपात में अंश दिए जाने का सूत्र मैंने तैयार किया है I दोनों सभाओं में शत-प्रतिशत सहमति से यह प्रस्ताव स्वीकार होगा, तुम निश्चिन्त रहो I

विक्रम – बेताल ! मुझे शीघ्रता से बता तेरी क्या योजना है?

बेताल विक्रम ! हरेक राशि के डिजिटल प्रमाण रहेंगे I राशि में से 20% सत्ताधारी दल के पार्टी फण्ड में, 15% राशि मतों के सर्वाधिक प्रतिशत के अनुसार सबसे बड़े विपक्षी दल के पार्टी फण्ड में अथवा दो या तीन दलों में आनुपातिक रूप से वितरित किया जा सकेगा I नोट शीट बनाने से लेकर लाभ दिलवाने तक का काम तो तृतीय श्रेणी शासकीय सेवक ही करते हैं, अतएव उस तृतीय श्रेणी कर्मचारी का इस निधि में सर्वाधिक अधिकार बनता है, उस कार्य से जुड़े सभी शासकीय सेवकों को 40% की राशि देय होगी I तुम तो जानते ही हो ब्यूरोक्रेट्स और मंत्री उसी के भरोसे सरकारें चलाते है और वे ही कार्यालयों की मुख्य धूरी होते हैं I उनको दी जाने वाली राशि परिजन कल्याण राशि के नाम से देय होगी, क्योंकि अधिकांश शासकीय सेवक शिष्टाचार निधि के लिए कहते हैं कि कम वेतन में घर नहीं चलता है I शेष 20% राशि सम्बन्धित विभागों में कार्यरत चतुर्थ श्रेणी से लेकर प्रथम श्रेणी के शासकीय सेवकों को देय होगी I सर्वाधिक आनुपातिक राशि चतुर्थ श्रेणी के शासकीय सेवकों को देय होगी, इससे शिष्टाचार निधि देने वाला व्यक्ति जरूरत मंद की सेवा करने की पुण्य प्राप्ति से सन्तुष्ट भी होगा I पांच प्रतिशत राशि प्रत्यक्ष-परोक्ष बिचौलियों को दी जाएगी I ये समस्त राशियाँ सभी प्रकार के करों से मुक्त होंगी I

विक्रम- बेताल ! अन्याय और पाप से सींचित राशि का नाम बदलने से वह पाप मुक्त नहीं हो सकेगी, और इस पाप की कमाई का उपभोग करने वाले पापी के परिवार के सभी लोगों को जीते जी नारकीय कष्ट भोगना पड़ेंगे I देने और लेने वाले सभी पाप के भागी होते हैं, इसलिए लोकतंत्र में सामान्य नागरिकों के संवैधानिक कार्य शीघ्र सम्पन्न हो सकें, ऐसा कोई निष्पाप समाधान बता I

बेताल –विक्रम ! यदि केन्द्र सरकार या सर्वोच्च न्यायालय पूरे देश के नागरिकों के हर आवेदन के उत्तर में, परिस्थितियों के अनुसार एक दिन से लेकर एक माह में स्पीकिंग अथवा रिजंड आदेश दिए जाने को अनिवार्य कर दें तो भ्रष्टाचार के नियंत्रण में मोदीजी को कल्पनातीत सफलता मिल सकती है I जिस व्यक्ति का मैंने उल्लेख किया है, वह कुछ वर्षों से सर्वोच्च न्यायालय, मोदीजी और नीति आयोग को तदर्थ एकाधिक बार आवेदन भेज चुका है, परन्तु उसकी शिकायत पीएमओ में पंजीकृत तो हो जाती है परन्तु होता कुछ नहीं है I     

विक्रम – बेताल ! मैं तेरे चातुर्य से प्रसन्न हूँ और तुझे तीन माह के लिए मुक्त करता हूँ I

विक्रम के ये वाक्य सुनते ही बेताल उड़न छू हो गया I

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डॉ मनोहर भंडारी

By News Thikhana

डॉ. मनोहर भंडारी ने शासकीय मेडिकल कॉलेज, इन्दौर में लंबे समय तक अध्यापन कार्य किया है। वे चिकित्सा के अलावा भी विभिन्न विषयों पर निरंतर लिखते रहते है।

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