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पारस को महंगा पड़ गया एनडीए से नाराजगी का इजहार, चाचा ने क्यों भतीजे चिराग पर क्यों जताया विश्वास, जानिए अंदर की बात

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पारस को महंगा पड़ गया एनडीए से नाराजगी का इजहार, चाचा ने क्यों भतीजे चिराग पर क्यों जताया विश्वास, जानिए अंदर की बात

राजनीति//Bihar/Patna :

राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (रालोजपा) का एनडीए से पत्ता साफ हो गया है। पशुपति पारस को भाजपा ने एक भी सीट नहीं दी है। दूसरी ओर चिराग पासवान के नेतृत्व वाली लोक जनशक्ति पार्टी- आर (लोजपा-आर) को पिछली छह सीटों के मुकाबले पांच सीटों से ही संतुष्ट हैं। आखिर क्या हुआ कि केंद्रीय मंत्री रहने के बावजूद भाजपा को पारस से इतनी खुन्नस हो गई।

चिराग पासवान के नेतृत्व वाली लोजपा (आर) क्यों पशुपति पारस की रालोजपा पर भारी पड़ गई, यह सवाल शिद्दत से खड़ा है। दोनों रिश्ते में चाचा-भतीजा हैं। 2019 का लोकसभा चुनाव भी दोनों ने साथ लड़ा था। पशुपति पारस अगर सांसद बने तो इसमें भतीजे चिराग पासवान की भूमिका भी कम नहीं थी। इसलिए पिता की पारंपरिक हाजीपुर सीट चिराग ने चाचा का ख्याल रखते हुए पारस को दे दी थी। तब लोजपा के संस्थापक राम विलास पासवान जिंदा थे। हालांकि उन्होंने चुनावी कमान चिराग को ही सौंप दी थी। जब केंद्र में मंत्री बनने की बात आई तो चाचा ने वह त्याग नहीं किया, जो भतीजे चिराग ने 2019 में उनके लिए हाजीपुर सीट देकर किया था। केंद्र में मंत्री बनने की बारी आई तो चाचा ने भतीजे को लंगड़ी मार दी। बहरहाल, चाचा-भतीजे की लड़ाई में भतीजा अब भारी पड़ गया है। पारस को आखिरकार एनडीए से आउट होना पड़ा। पर, बात सिर्फ इतनी ही नहीं है कि चिराग को इतनी तवज्जो भाजपा ने क्यों दी। पारस की एक नहीं सुनी। इसके कई कारण हैं, जिन पर हम चर्चा करेंगे।
चिराग की ताकत को आजमा चुकी है भाजपा
लोजपा के दोनों धड़ों में चिराग पासवान की ताकत सबसे अधिक रही है। यह न सिर्फ भाजपा जानती है, बल्कि एनडीए के प्रमुख साथी नीतीश कुमार भी इस बात को भलीभांति जानते हैं। नीतीश की 2020 के विधानसभा चुनाव में जो दुर्गति हुई, उसके पीछे चिराग पासवान स्पष्ट कारण माने गए। यह बात नीतीश कुमार भी जानते हैं और कहते भी रहे हैं। भाजपा ने चिराग के बारे में यह भी जाना है कि नीतीश कुमार के दबाव पर एनडीए से निकाले जाने के बावजूद चिराग ने पीएम नरेंद्र मोदी के हनुमान की भूमिका निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वे मंत्री नहीं बन पाए। पिता का बंगला खाली करना पड़ा। अपनी पार्टी के छह सांसदों के बावजूद बंटवारे में वे इकलौता सांसद रह गए। इसके बावजूद उनकी भाजपा और मोदी के प्रति लायल्टी में कोई कमी नहीं आई। जब सीटों के बंटवारे की बात आई तो चिराग ने शालीनता से अपना ग्रिवांस रखा। छह सीटों के बजाय उन्हें पांच सीटें भाजपा ने दी, तब भी उनकी जुबान से भाजपा के लिए कोई टेढ़े-मेढ़े शब्द नहीं निकले।
पारस में चिराग जैसी लॉयल्टी का अभाव रहा
चिराग पासवान ने सारे अपमान झेले। पिता की खड़ी हुई पार्टी को चाचा के स्वार्थ के कारण विभाजित होते देखा। पारस की बेईमानी के कारण मंत्री पद से वंचित हो गए। इतना ही नहीं, जिस बंगले में जन्म से लेकर राजनीति के पादान पर कदम रखने तक समय बिताया था, वह भी चाचा के कारण उनसे छीन लिया गया। फिर भी वे कभी भाजपा या पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ मुखर नहीं हुए। पशुपति पारस ने ठीक इसके उल्टा काम किया। सीटों के बंटवारे में हाजीपुर सीट वे छोड़ने को तैयार नहीं हुए। इतना ही नहीं, नाराजगी का इजहार उन्होंने मीडिया के सामने भी कर दिया। सार्वजनिक मंचों पर भी वे हाजीपुर सीट को लेकर अड़े रहे और भाजपा को इशारों में बहुत कुछ सुना दिया। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि एनडीए की सूची के अधिकृत ऐलान के बाद वे कोई भी फैसला ले सकते हैं। कोई भी फैसला से उनका तात्पर्य साफ था कि वे एनडीए का साथ भी छोड़ सकते हैं। लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी से उनकी बातचीत के संकेत भी बाहर आने लगे थे। भाजपा ने उन्हें संतुष्ट करने के लिए गवर्नर तक बनाने का आफर दिया। पर, वे हाजीपुर से चुनाव लड़ने की जिद पर अड़े रहे। चिराग से अधिक सीटों की मांग करते रहे। सच तो यही है कि चिराग ने जितनी शालीनता दिखाई, उतने असालीन आचरण का पारस ने प्रदर्शन किया।
पारस परिवार के न हुए तो किसके हो सकते.!
भाजपा को यह भी पता था कि जिस पारस को उनके परिवार ने खड़ा किया, आगे बढ़ाया और मंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में परोक्ष तौर पर मदद की, वे जब उसके नहीं हुए तो भाजपा के क्या खाक होते। उनकी आंखों पर तो स्वार्थ का चश्मा चढ़ा था। उन्हें सिर्फ अपनी सूझ रही थी। मंत्री बन कर भी उन्होंने कोई ऐसा उल्लेखनीय काम नहीं किया, जिससे उनकी छवि में चमक दिखती। सांगठनिक तौर पर भी उनकी कोई धमक नहीं सुनाई पड़ी। वे बिहार में अपनी पार्टी के विस्तार या जनता के सुख-दुख से दूर ही रहे। दूसरी ओर चिराग पासवान बिहार के हर ऐसे मुद्दे पर मुखर रहे, जिससे उनकी संभावनाशील नेता के रूप में पहचान बनती रही। लोगों से मिलना। बिहार के कोने-कोने में जाना। ज्वलंत मुद्दों को उठाना। दूसरे शब्दों में कहें तो अपनी पार्टी के इकलौते सांसद होने के बावजूद उन्होंने अलख जगाए रखा। पशुपति पारस में इसका नितांत अभाव था। आज भी बिहार के दलित समाज में चिराग पासवान की तो पहचान है, लेकिन पारस को ज्यादातर दलित जानते तक नहीं हैं। चिराग किसी पहचान के अब मोहताज नहीं रह गए हैं। हालांकि सबको यह पता है कि वे राम विलास पासवान के बेटा हैं। उन्हें नैसर्गिक उत्तारधिकारी हैं। उनके पास सांगठनिक क्षमता है तो लोगों को प्रभावित करने की कला भी है।
पारस भी चिराग के नेत्तृत्व मे लड़े थे चुनाव
पिछले लोकसभा चुनाव में राम विलास पासवान जीवित थे, लेकिन पार्टी की कमान चिराग पासवान को ही सौंप दी थी। पार्टी के सारे फैसले चिराग ही लेते थे। 2020 में हुए बिहार विधानसभ के चुनाव में चिराग अपना जलवा दिखा चुके थे। यह अलग बात है कि उन्होंने उम्मीदवार तो 134 उतारे, लेकिन उनमें एक ही जीत पाया। पर, नीतीश से नाराजगी का स्वाद उन्हें चखा दिया। आज भी नीतीश को मलाल है कि चिराग के कारण जेडीयू को 30-32 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। लोकसभा चुनाव के टिकट बंटवारे में भी चिराग ने परिवार का ख्याल रखा। खुद तो जमुई से लड़े ही, चचेरे भाई (रामचंद्र पासवान के बेटे) प्रिंस राज को उम्मीदवार बनाया तो चाचा को अपनी विरासती हाजीपुर सीट दी। यानी छह में तीन सीटें तो परिवार के पास ही रखीं। बाकी सीटों पर भी उन्होंने जो उम्मीदवर दिए, वे भी जीत गए। यानी राजनीति का पहला कदम ही चिराग के सारगर्भित रहा। भाजपा उनके इन गुणों को कैसे नजरअंदाज कर सकती थी।

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author

Jyoti Bala

By News Thikhana

Senior Sub Editor

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