कच्चातिवु: आखिर क्यों है इस वीरान द्वीप पर भारत और श्रीलंका की नजर

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कच्चातिवु: आखिर क्यों है इस वीरान द्वीप पर भारत और श्रीलंका की नजर

राजनीति//Delhi/New Delhi :

लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कच्चातिवु द्वीप को लेकर भारत में राजनीति गरम हो गई है और विवाद बढ़ गया है। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कांग्रेस पर निशाना साधा है। वहीं, कांग्रेस भी हमलावर है। कच्चातिवु द्वीप ज्वालामुखी विस्फोट से बना था और अंग्रेजों के समय से ही इसको लेकर विवाद है।

भारत और श्रीलंका के बीच पाक जलडमरू मध्य में स्थित एक छोटे से द्वीप कच्चातिवु को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बीजेपी सरकार और कांग्रेस के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। यह द्वीप भारत के तमिलनाडु राज्य के करीब है। कच्चातिवु द्वीप को लेकर आजादी के बाद से ही विवाद था और और 1974 में हुए समझौते के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इसे श्रीलंका को दे दिया था। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इस मामले में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के रवैये की आलोचना की। उन्होंने कच्चातिवु द्वीप को श्रीलंका को देने के लिए तमिलनाडु की वर्तमान डीएमके सरकार को भी जिम्मेदार ठहराया। आखिर, कच्चातिवु द्वीप का क्या इतिहास रहा है और इसको लेकर भारत और श्रीलंका ने क्यों जोर लगाया हुआ है?

कच्चातिवु एक छोटा-सा वीरान द्वीप है जो भारत और श्रीलंका के बीच हिंद महासागर में स्थित है। यह 285 एकड़ में फैला हुआ है और 14वीं सदी में ज्वालामुखी विस्फोट से बना था। अंग्रेजों के समय में भारत और श्रीलंका दोनों ही इस द्वीप का प्रशासन करते थे। तमिलनाडु के रामनाथपुरम के राजा रामनद कच्चातिवु द्वीप के स्वामी थे, जो मद्रास प्रेसीडेंसी का हिस्सा था। साल 1921 में श्रीलंका और भारत दोनों ने ही जमीन के इस टुकड़े को मछली पकड़ने के लिए दावा किया। यह विवाद बढ़ता चला गया। भारत की स्वतंत्रता के बाद श्रीलंका के साथ इस विवाद को दूर करने पर बात हुई। इसे बाद 1974 में हुए समझौते के तहत इस द्वीप को भारत ने श्रीलंका को दे दिया।
कच्चातिवु द्वीप के आसपास मछलियों का भंडार
इस समझौते के बाद भी भारत और श्रीलंका के बीच विवाद खत्म नहीं हुआ। भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि इस समझौते की वजह से पिछले 20 वर्षों में भारत के 6,180 मछुआरों को श्रीलंका ने हिरासत में ले लिया। इस दौरान श्रीलंका ने मछली पकड़ने वाली 1175 नौकाओं को भी जब्त किया। विदेश मंत्री ने जवाहरलाल नेहरू द्वारा दिए गए एक बयान को कोट करते हुए कहा कि नेहरू ने इस द्वीप को ‘छोटा द्वीप’ बताते हुए कहा था कि वे इस छोटे से द्वीप को बिल्कुल भी महत्व नहीं देते और उन्हें इस पर अपना दावा छोड़ने में कोई झिझक नहीं है। जयशंकर के मुताबिक नेहरू ने यहां तक कहा था कि उन्हें इस तरह के मामले अनिश्चितकाल तक लंबित रखना और संसद में बार-बार उठाया जाना पसंद नहीं है।
‘लिटल रॉक’ कहकर महत्वहीन बताया
जयशंकर ने बताया कि इंदिरा गांधी ने इसे ‘लिटल रॉक’ बताते हुए कहा था कि इसका कोई महत्व नहीं है। विदेश मंत्री ने बताया कि वर्ष 1974 में दोनों देशों के बीच समझौता हुआ, जिसमें कच्चातिवु द्वीप को श्रीलंका को दे दिया गया, लेकिन वहां पर फिशिंग का अधिकार भारतीय मछुआरों के पास भी था। फिर 1976 में यह तय हुआ कि भारत श्रीलंका की टेरेटरी का सम्मान करेगा। दरअसल, यह पूरा इलाका समुद्री मछलियों और सीफूड से भरा हुआ है। भारत और श्रीलंका दोनों ही देशों के मछुआरे यहां से मछली पकड़ते रहे हैं। भारत के मछुआरों के पास मछली पकड़ने के बड़े-बड़े जहाज हैं, जो उसे श्रीलंका पर बढ़त देते हैं। इससे तमिलनाडु को भी बंपर कमाई होती है। साल 2015 में तमिलनाडु ने 93,477 टन सीफूड का निर्यात किया था। इससे 5300 करोड़ की कमाई हुई थी। भारत हर साल अरबों डॉलर का सीफूड निर्यात करता है, इसमें बड़ा हिस्सा कच्चातिवु के पास से आता है। इस इलाके में प्रचुर मात्रा में झींगे भारतीय नावों को श्रीलंकाई जलक्षेत्र में प्रवेश करने के लिए आकर्षित करते हैं। इसी वजह से उनकी गिरफ्तारी भी होती है।

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Jyoti Bala

By News Thikhana

Senior Sub Editor

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