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परीक्षा चिन्तितों को परीक्षा योद्धा में परिणत कर दिया, मोदीजी ने..!

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परीक्षा चिन्तितों को परीक्षा योद्धा में परिणत कर दिया, मोदीजी ने..!

लेख//Madhya Pradesh/Indore :

श्री दुर्गासप्तशती के प्रथम अध्याय में राजा सुरथ का उल्लेख है, जो प्रजा का अपने औरस पुत्रों की तरह ध्यान  रखते थे I ठीक इसी तरह मोदीजी भी अपने देश के सभी नागरिकों को अपना ही सगा-सम्बन्धी मानते हुए उनके उत्थान में विगत नौ वर्षों से निरन्तर अनथक प्रयास करते हुए सड़कों का निर्माण, उज्ज्वला योजना, हर घर बिजली, हर घर पानी, पक्के मकान, हर नारी बनें अपने बलबूते लखपति, मुद्रा लोन, मेक इन भारत आदि अनेकानेक योजनाओं ने नागरिकों के जीवन को आलोकित किया है I

 परन्तु एक ऐसा वर्ग था जिसकी तरफ आज तक किसी ने भी ध्यान नहीं दिया था I

आइये जानते हैं, कौन-सा वर्ग है, वह..

हरेक माता-पिता चाहते हैं कि उनकी संतान बिना किसी तनाव और चिन्ता के सफलता के शिखरों को छूती रहे तथा किन्हीं भी स्थितियों में किसी परीक्षा, प्रतिस्पर्धा अथवा पढाई के भय से न तो अवसाद में जाए और न ही आत्मघात करें I वे यह भी नहीं चाहते हैं कि उनकी लाड़ली संतान यदि किसी अन्य नगर में पढ़ाई के लिए अकेली रह रही है तो वह किसी तरह के अकेलेपन से ग्रस्त हों और उसके मन-मस्तिष्क में यह बात आए कि वह तो इस परीक्षा की दुनिया में नितान्त ही अकेला और असहाय है I सभी माता-पिता ये भी प्रयास करते हैं कि उस अन्जान-अनदेखे-अपरिचित नगर में उनका कोई निकट अथवा दूर का सगा-सम्बन्धी अथवा उनके मित्र का कोई सगा-सम्बन्धी निकल आए जो कभी-कभार ही सही उनकी प्यारी संतान को सम्बल दे सकें ताकि उसका मनोबल उच्च बना रहे I यदि किसी कारण से ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होता है तो माता-पिता किसी शिक्षक से मिलकर अपनी चिन्ता के चलते उनके हाथ-पैर जोड़कर अपनी संतान का ध्यान रखने की अनुनय-विनय करते हैं I इसके अतिरिक्त वे फोन करके हर दिन अपनी संतान से बातचीत कर उसके मनोबल को बनाए रखते हैं और अकेलेपन की अनुभूति से उसे मुक्ति दिलाने का प्रयास करते रहते हैं।

परन्तु क्या कोई माता-पिता अपने बच्चे के बिलकुल पास रहकर उसका मनोबल निरन्तर बढ़ा पाते हैं, नहीं कदापि नहीं, कामकाज, नौकरी आदि के चलते यह असम्भव है I

इन दिनों पिता और माता भी बच्चे के भविष्य निर्माण के लिए एक नए प्रकार के व्यामोह के चक्कर में अपनी संतानों के परोक्ष शत्रु-से बन गए हैं I हालांकि उनकी ऐसी कोई मंशा नहीं होती है, वास्तव में संतान के प्रति अतिशय अनुराग और उसके भविष्य के प्रति गहन चिन्ता ही उन्हें ये सब करने के लिए विवश कर देती है और फिर उनका जो व्यवहार संतान के प्रति होता है, वह प्रत्यक्ष रूप से संतान के प्रति शत्रुवत होता चला जाता है I

कोटा या कोटा जैसे कोचिंग प्रधान नगरों अथवा छोटे-छोटे नगरों तथा कस्बों में लाड़ली संतानें पढ़ाई-परीक्षा के भय से, माता-पिता की महत्वाकांक्षा के चलते अवसाद या मृत्यु का हाथ थाम कर महायात्रा के लिए निकल पड़ती हैं I परीक्षा में कम अंक प्राप्त करने पर भी सातवीं, आठवीं और नवीं कक्षाओं के बच्चों की आत्मघात की ह्रदय विदारक घटनाओं को देश ने देखा है I बच्चों के आत्मघात से देश और समाज तथा शिक्षा जगत में अस्थायी रूप से थोड़ी-सी हलचल अवश्य होती है और फिर सब शान्त हो जाता है, मानो कुछ हुआ ही नहीं I

जब ऐसी घटनाएं घटित होती हैं तो समूचा समाज आन्दोलित हो जाता है, अफसोस जताने लगता है, व्यवस्था को कोसने का काम भी हर कोई करने लगता है, परन्तु ...........

मेरी समस्त जानकारी के आधार पर मैं यह कहने की धृष्टता कर रहा हूँ कि पूरे भारतवर्ष में आज तक किसी माता-पिता या शिक्षक अथवा शिक्षाविद अथवा मनोविज्ञानी अथवा समाजविज्ञानी या राजनेता ने देश की नौनिहाल पीढ़ी को पढ़ाई, परीक्षा और प्रतिस्पर्धा के महापिशाच से मुक्त करने की दिशा में कोई सार्थक और धरातलीय पहल नहीं की है I

हाँ, यह अवश्य पता है कि एक पिता ने सड़क के गड्ढे के कारण हुई अपने युवा बेटे की मृत्यु के उपरान्त अपने पैसों से सड़कों के गड्ढों को भरने का अभियान चला रखा है I दशरथ मांझीजी के काम के विषय में भी पता है, परन्तु बच्चों को अवसाद से निकालने की दिशा में किसी भी धरातलीय सार्थक पहल के विषय में मुझे ज्ञात नहीं है I

फना निजामी कानपुरी का यह शेर मेरी स्मृति में अनायास आ गया है --

साहिल के तमाशाई हर डूबने वाले पर

अफसोस तो करते हैं, इमदाद नहीं करते

देशभर की हजारों-लाखों समस्याओं से जूझते हुए और उनका सटीक समाधान करते हुए भी मोदीजी ने राजा सुरथ की तरह देशभर की किशोर और युवा पीढी को अपना मानते हुए परीक्षा के महाभय से मुक्ति की दिशा में पर्याप्त चिन्तन किया और फिर अपनी सुचिन्तित योजना को धरातलीय स्वरूप प्रदान करते हुए, उस महाभय को परास्त करने के लिए स्वयं ही विद्यार्थियों से प्रत्यक्ष संवाद करने उतर पड़े और धीरे-धीरे उन्होंने देश के ढाई करोड़ परीक्षा चिन्तित [एग्जाम WORRIER] विद्यार्थियों को परीक्षा वारियर [warriors] के रूप में परिणत करने में सफलता अर्जित कर ली है I

और तो और उन्होंने अत्यन्त ही प्रभावी शैली में “एग्जाम वारियर्स” अर्थात् परीक्षा योद्धा नामक पुस्तक रच डाली, इस पुस्तक की रचना मात्र से समझा जा सकता है कि विश्व के सर्वाधिक व्यस्त राजनेता के मन में अपने देश की भावी कर्णधार पीढी की कितनी गहन चिन्ता है I इस पुस्तक की विषय-वस्तु इतनी प्रभावी और सहज-सरल है कि विद्यार्थी इसे पढ़कर पढ़ाई के भूत से स्वयं भी मुक्त हो सकता है I मेरे अभिमत में यह पुस्तक देश के हरेक स्कूल में अनुवार्य रूप से होना चाहिए I इसका अध्ययन अभिभावकों और शिक्षकों को भी करना चाहिए I यह पुस्तक एक संगीसाथी की तरह हरेक बच्चे के पास रहेगी तो उसके अकेलेपन को कदाचित दूर करने में सफल होगी ही I यह पुस्तक 13 भारतीय भाषाओं में अनुदित हो चुकी है, और इसकी कीमत मात्र 125 रुपए की है, मेरा देश के सभी अभिभावकों से प्रार्थना है कि इसे अपने बच्चे का अमोघ सुरक्षा कवच मानते हुए पढने के लिए भेंट करें और बार-बार आग्रह करें कि वह इस पुस्तक का अध्ययन करता रहे और परीक्षा तथा पढ़ाई के भूत से मुक्ति पाता रहे I मोदीजी का यह अभियान लगभग पांच छह वर्षों से निरन्तर चल रहा है और निरन्तर श्रेष्ठता और अधिक प्रभावशील होने की दिशा में अग्रसर होता जा रहा है I

अस्तु, कल दिनांक 02.02.2024 को नईदिल्ली में शून्य से 18 वर्ष तक के बच्चों के हितार्थ गठित राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग [एनसीपीसीआर] के अध्यक्ष श्री प्रियांकजी कानूनगो की अध्यक्षता में देशभर के लगभग ढाई सौ शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञों को प्रबोधन-प्रशिक्षण दिया गया और इस प्रबोधन उत्सव में ब्लूक्राफ्ट डिजिटल ऑर्गेनाइजेशन के प्रमुख कार्यकारी अधिकारी तथा मोदीजी के इस अभियान से जुड़े श्री अखिलेशजी मिश्रा [शिक्षा से अभियंता] ने भी मोदीजी के परीक्षा पर्व 6.0 के विषय में प्रस्तुति के माध्यम से सम्बोधित और प्रेरित करते हुए सभी से आव्हान किया है कि आपको मोदीजी के संदेशवाहक के रूप में देश के 256 जिलों के सभी विद्यार्थियों को परीक्षा योद्धा के रूप में परिणत करना है I

ऐसे अनूठे जनसेवक को शत-शत नमन करता हूँ I  

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डॉ मनोहर भंडारी

By News Thikhana

डॉ. मनोहर भंडारी ने शासकीय मेडिकल कॉलेज, इन्दौर में लंबे समय तक अध्यापन कार्य किया है। वे चिकित्सा के अलावा भी विभिन्न विषयों पर निरंतर लिखते रहते है।

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