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समंदर पर राज और खतरे में भारतीय जहाज ? आखिर किस ओर बढ़ रही दुनिया

सेना

समंदर पर राज और खतरे में भारतीय जहाज ? आखिर किस ओर बढ़ रही दुनिया

सेना/नौसेना/Delhi/New Delhi :

भारत को प्रमुख जियो-पॉलिटिकल खिलाड़ी बनने और लाल सागर जैसे उभरते खतरों से निपटने के लिए अपनी समुद्री क्षमता को बढ़ाने की जरूरत है। इसमें नौसैनिक और नागरिक क्षमता दोनों शामिल हैं। समुद्र में सामरिक शक्ति ऐसा क्षेत्र हैं, जिस पर भारत को काफी ज्यादा और जल्दी ही काम करना होगा। इसमें जरा भी कसर भारत के विकसित होने के सपने को धूमिल कर सकती है।

लाल सागर में यमन के हूतियों ने हाल में भारत आ रहे व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाया। इन हमलों ने फिर से एक बात उजागर की। इसने दिखाया कि ग्लोबल ट्रेड के लिए समुद्री सुरक्षा कितनी महत्वपूर्ण है। समुद्री शक्ति और सुपरपावर का दर्जा पाने वाले देश के बीच हमेशा एक रिश्ता रहा है। जैसे-जैसे भारत की भू-राजनीतिक प्रोफाइल बढ़ेगी, उसे समुद्री शक्ति में ज्यादा से ज्यादा संसाधनों का निवेश करने की जरूरत होगी। यह उसकी बढ़ती आकांक्षाओं को पूरा करने और उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए जरूरी है। 
हिंद महासागर की बड़ी समुद्री शक्ति  
21वीं सदी में इंडो-पैसिफिक दो कारणों से प्रमुख भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक क्षेत्र के रूप में उभरा है। पहला, क्षेत्र की आर्थिक और जनसांख्यिकीय शक्ति। दूसरा, एक गैर-लोकतांत्रिक और आक्रामक चीन का उदय। भारत इस क्षेत्र का प्रमुख घटक है। वह हिंद महासागर की बड़ी समुद्री शक्ति है। इस क्षेत्र का दूसरा किरदार अमेरिका है। यह संयोग है कि इंडो-पैसिफिक निर्माण के अस्तित्व में आने से भारत प्रमुख आर्थिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक शक्ति के रूप में उभरा है। इसमें जनसांख्यिकीय लाभ है। यह भारत को अपनी समुद्री शक्ति को और विकसित करने का एक ऐतिहासिक अवसर देता है।
95 फीसदी ट्रेड समुद्री मार्गों से 
हालांकि, भारत की व्यापक राष्ट्रीय शक्ति में समुद्री शक्ति एक कमजोर कड़ी बनी हुई है। वॉल्यूम के लिहाज से भारत का 95 फीसदी ट्रेड और मूल्य के हिसाब से 68 फीसदी समुद्री मार्गों से होता है। भारत के ट्रेड में भारतीय जहाजों की हिस्सेदारी 1987-88 में 40.7 फीसदी से घटकर 2018-19 में लगभग 7.8 फीसदी रह गई है। दुनिया के 50 सबसे व्यस्त बंदरगाहों में सिर्फ दो भारतीय बंदरगाह शामिल हैं। भारत के व्यापारिक जहाजरानी बेड़े में 2021 में 1,491 जहाज शामिल थे। डेड वेट टन भार (कुल ग्लोबल टन वेट का 1.3 फीसदी) की क्षमता के मामले में भारत दुनिया में 19वें स्थान पर था।
जहाज निर्माण में हिस्सेदारी सिर्फ 0.12 फीसदी  
ग्लोबल शिपबिल्डिंग में भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 0.12 फीसदी है। इस तरह 2021 में भारत में निर्मित वैश्विक जहाजों की संख्या में वह 15वें स्थान पर था। वैश्विक जहाज मरम्मत और रखरखाव का बाजार 2028 तक 40 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। लेकिन, सस्ते और कुशल कार्यबल के फायदे होने के बावजूद इस क्षेत्र में भारत की हिस्सेदारी 1 फीसदी से भी कम है।
नौसेना आधुनिकीकरण जारी 
समुद्री शक्ति के तमाम मेट्रिक्स में भारत कई देशों से पीछे है। इनमें समुद्री वैज्ञानिक अनुसंधान, पानी के भीतर खोज और खनन के मामले शामिल हैं। समुद्री सैन्य शक्ति के संदर्भ में बेशक भारत के पास सक्षम नौसेना है। लेकिन, प्रतिकूल समुद्री शक्तियों के साथ समुद्री सैन्य असंतुलन को रोकना महत्वपूर्ण है। लिहाजा पर्याप्त और तकनीकी रूप से प्रासंगिक समुद्री बलों को बनाए रखने के लिए जहाज और पनडुब्बी निर्माण कार्यक्रम जरूरी है।
अनदेखा इकनॉमिक इंजन 
हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य रखा है। आरबीआई के एक लेख में कहा गया है कि इसे हासिल करने के लिए भारत की अर्थव्यवस्था को सालाना 7.6 फीसदी या उससे ज्यादा की निरंतर रफ्तार से बढ़ना होगा। समुद्री क्षेत्र आज भारत की जीडीपी में लगभग 5 फीसदी का योगदान देता है। भारत सरकार ने समुद्री क्षेत्र में वैश्विक और घरेलू निवेश को आकर्षित करने के लिए कई पहल की है। इनमें नेशनल मैरीटाइम डवलपमेंट प्रोग्राम, सागरमाला कार्यक्रम, मैरीटाइम इंडिया विजन 2030 की घोषणा शामिल है। लेकिन, भारत के समुद्री क्षेत्र को भारत की जीडीपी में अपना योगदान दोगुना कर लगभग 10 फीसदी करने के लिए और भी बहुत कुछ करने की जरूरत है।
समुद्री सप्लाई चेन की सुरक्षा 
हमें अपने जहाज निर्माण क्षेत्र और शिपिंग बेड़े पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। इन दोनों क्षेत्रों में पर्याप्त राष्ट्रीय क्षमता के बिना भारत दूसरे दर्जे की समुद्री शक्ति बना रहेगा। भारत के राष्ट्रीय शिपिंग बेड़े में गिरावट से भारत के आर्थिक, वाणिज्यिक और रणनीतिक लाभ कम हो गए हैं। भारतीय कार्गो के परिवहन के लिए विदेशी वाहकों पर निर्भरता बढ़ गई है। इनके कारण ही महत्वपूर्ण सप्लाई चेन बन पाती है। इस मोर्चे पर हमें ज्यादा करने की जरूरत है।
नई चुनौतियां 
भारत समुद्री अस्थिरता के दो चापों के बीच स्थिरता के गढ़ के रूप में बैठा है। पश्चिमी चाप जो स्वेज नहर से अदन की खाड़ी तक पश्चिम एशिया, पूर्वोत्तर अफ्रीका और हॉर्न ऑफ अफ्रीका और अरब की अशांत भूमि से होकर गुजरता है। इसके उत्तर में होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से समान रूप से अशांत समुद्री मार्ग है। भारत का ज्यादातर तेल और प्राकृतिक गैस आयात इसी क्षेत्र से होता है। हमारे पूर्व में मलक्का जलडमरूमध्य और अशांत दक्षिण चीन सागर है। यहां से होकर भारत का आधे से अधिक समुद्री व्यापार गुजरता है। लाल सागर में व्यापारिक जहाजों पर ताजा हमले भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए खतरे की बानगी है।
समुद्री परिदृश्य के बारे में सोचने की जरूरत 
भारत को सभी पहलुओं को शामिल करते हुए नेशनल मैरीटाइम पॉलिसी के जरिये अपनी व्यापक समुद्री शक्ति के विकास के लिए एकीकृत दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। मजबूत आर्थिक विकास, अनुकूल जनसांख्यिकी, लोकतांत्रिक राजनीति, सॉफ्ट पावर और इंडो-पैसिफिक निर्माण के रूप में अनुकूल समुद्री वातावरण के साथ भारत के पास अपनी प्राचीन महाशक्ति का दर्जा हासिल करने का ऐतिहासिक अवसर है। इस लक्ष्य को हासिल करने में समुद्री शक्ति प्रमुख भूमिका निभाएगी।

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Jyoti Bala

By News Thikhana

Senior Sub Editor

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