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नन्हे शिशुओं की कातर पुकार, हमें स्कूल मत भेजो मार-मार..!

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नन्हे शिशुओं की कातर पुकार, हमें स्कूल मत भेजो मार-मार..!

लेख//Madhya Pradesh/Indore :

दो दिन पहले की बात है, मैं नई दिल्ली से देर रात इन्दौर लौटा था, प्रतिदिन की तरह मैं जल्दी नहीं जाग पाया था, क्योंकि मैं कोई मोदीजी थोड़े ना हूँ, जिन्होंने नीन्द पर विजयी पा ली है I अस्तु, मैं पौने छह बजे भी सो रहा था कि किसी ने मुझे झिंझोड़-झिंझोड़ कर जगा दिया I 
देखा तो एक विशालकाय और महाबली ब्रह्मराक्षस मेरे सामने थे, मैं भयभीत होकर मन ही मन हनुमानजी का नाम लेते हुए बोला आप कौन हैं?
मैं भारतवर्ष के करोड़ों शिशुओं की एकीकृत आत्मा हूँ और मैंने अपनी बात तुम्हारे माध्यम से मोदीजी के सामने रखने के लिए एक ब्रह्मराक्षस के शरीर में प्रवेश किया है I 
मैंने बोला – आप मोदीजी से ही सीधे-सीधे बात कर लीजिए, वे प्रज्ञापुरुष है I इसके अतिरिक्त बात यह है कि मैं उन तक आपकी बात कैसे पहुंचा सकूंगा? 

 

ब्रह्मराक्षस [एकाएक अत्यन्त ही क्रोधावेश में] बोलें – तुम मातृभाषा के पक्षधर हो, डॉक्टर हो और लेखक भी, इसलिए देशभर के हम सब शिशुओं की दुर्गति की बात भाषा विज्ञान, विज्ञान, मनोविज्ञान और समाज विज्ञान के आधार पर तुम्हें ही पहुंचाना है I एक और भी अति विशिष्ट कारण है, जिसे बाद में बताऊंगा I फिर और अधिक क्रोध में वे बोले - समझे कि नहीं I 
मैं बोला- जी समझ गया हूँ, आप बताइए, क्या सन्देश मोदीजी तक पहुँचाना है?

कृपया मोदी को लिखा गया यह पत्र भी पढ़ें

श्रद्धेय श्री मोदी साहेब.. (newsthikana.com)
ब्रह्मराक्षस उवाच- ये कागज-कलम लो और हर बात ठीक से लिखते जाओ I हमारा जैसे ही जन्म होता है, हमारे पिताजी और अन्य लोग फोटो खींचने लगते हैं, जबकि हमारी आँखों के पर्दें [रेटिना] ठीक से विकसित नहीं होने के कारण मोबाइल के घातक रेडिएशन को सहन नहीं कर पाते हैं, जो कि हमारी दृष्टिक्षमता के लिए घातक सिद्ध हो सकता है I इसके अतिरिक्त हमारा विकासशील कोमल शरीर इन घातक रेडिएशन को अधिक मात्रा में अवशोषित कर लेता है, जिसके कारण आनुवांशिक निर्माण में बदलाव आ सकते हैं और कैंसर की कोशिकाओं के विकास को बढ़ावा मिल सकता हैI हमारी आँखों की मांसपेशियां बहुत कम प्रकाश में कम्फर्टेबल रहती हैं I भारतीय लोग अपने विज्ञानसम्मत संस्कारों को भूल चुके हैं, शिशु के जन्म के दस दिन बाद सूर्य पूजा का विधान है, तब तक शिशुओं को घर में ही अन्धेरे में रखना स्वास्थ्यप्रद होता है I मोदीजी से कहना इस विषय में शोध करवाएं और इस घातक फोटोग्राफी से हमें मुक्ति दिलाएं I 
मैं बोला – जी I 
ब्रह्मराक्षस उवाच- दूसरी बात लिखो- डॉ. नोम चोमस्की जैसे विश्वविख्यात भाषा विज्ञानी, काग्निटिव विज्ञान के ज्ञाता, इतिहासकार तथा 150 पुस्तकों के लेखक ने कहा था कि नवजात शिशुओं के मस्तिष्क में जैविक धरोहर के रूप में भाषा अधिग्रहण उपकरण [लेंग्वेज एक्विजिशन डिवाइस] होता है, यह नैसर्गिक रूप से अपनी मातृभाषा और उसकी व्याकरण को सहजता से ग्राह्य करने की क्षमता लिए रहता है I इसी उपकरण के कारण हम बच्चों को बिना पढाए ही अपनी मातृभाषा के शब्दों के अर्थ और व्याकरण की समझ सरलता और सहजता से हो जाती है I हमारी माताएं उस डिवाइस को नष्ट-भ्रष्ट करते हुए, जन्मते ही हमारे मन-मस्तिष्क में परायी भाषा अर्थात् अंगरेजी के शब्दों को बरबस घुसेड़ना शुरू कर देती हैं, बेटा ! ये केला नहीं बनाना है, ये पीला नहीं येलो है I बेटा ! अंकल से शेक हैण्ड करो I ऐसा क्रोध आता है कि पूछो ही मत I मस्तिष्क के न्यूरान्स में आपाधापी मच जाती है, वे न्यूरान्स असमंजस और उहापेह में पड़ जाते हैं I वे बेचारे समझ ही नहीं पाते हैं कि इस थोपी हुई अंगरेजी से मुक्ति कैसे पाएं और अपनी नैसर्गिक डिवाइस की रक्षा कैसे करें I इन दुष्ट, मूर्ख, अवैज्ञानिक और अशिष्ट माता-पिताओं को समझाओ कि इस आतंरिक महासंघर्ष और द्वंद्व में हमारे मन में उनके प्रति एक घोर घृणा तथा शत्रुता का भाव उत्पन्न हो जाता है और हम विद्रोही होने लगते हैं I तुम मोदीजी को बताना कि ओबामा की पत्नी ने शेक हैण्ड के खतरों से बचाने के लिए फिस्ट बंप अभियान चलाया था और दूसरी बात ये है कि हमारी त्वचा के संवेदी रिसेप्टर्स को मां का स्पर्श ही अच्छा लगता है और उस स्पर्श के कारण ऑक्सीटोसिन निकलता है, जो मां और शिशु के बीच पारस्परिक अनुराग के सम्बन्धों को दृढ़ता और दीर्घायु प्रदान करता है I इसलिए शेक हैण्ड से हमें मुक्ति दिलाना है, थोड़ा कहा ज्यादा समझना I देश के ख्यात न्यूरोलॉजिस्ट श्रेष्ठ चिकित्सा शिक्षक सम्मान विजेता पद्मश्री डॉ. अशोक पनगढ़िया की भाषा विषयक अवधारणा का भी उल्लेख मोदीजी को करना, जिन्होंने कहा था कि मातृभाषा में पारंगत व्यक्ति दूसरी भाषा सरलता से सीख जाते हैं I उनसे ये भी कहना कि भारतरत्न डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने धर्मपेठ विज्ञान महाविद्यालय, नागपुर के स्वर्णजयंती समारोह के अवसर पर कहा था कि बच्चों को विज्ञान और गणित की शिक्षा स्थानीय भाषा में ही दी जाना चाहिए, बच्चे अंगरेजी तो मेरी भांति बाद में कभी भी सीख लेंगे, दूसरी भाषा सीखना कोई बड़ी बात नहीं है I आप तो यह भी जानते हैं कि मानव मस्तिष्क का पूर्ण विकास एक वर्ष से लेकर पांच वर्ष की उम्र तक पूर्ण होता है, ऐसे में उस विकास को बाधित करने के क्या निहितार्थ हैं?  
मैंने कहा – जी, अवश्य मैं भरसक प्रयास करूँगा I  
ब्रह्मराक्षस उवाच - तीसरी बात लिखो, ये भी आवश्यक है, ध्यान रहे, इस विषय में लिखते समय अपने अभी तक के अर्जित समूचे ज्ञान का उपयोग करना I तनिक आवेश में वे बोले - सुन रहे हो ना I 
मैं बोला- जी, मैं हरेक बात पूरे मनोयोग से सुन रहा हूँ और लिख भी रहा हूँ I साथ ही मैं चिन्तन भी करता जा रहा हूँ I 
ब्रह्मराक्षस उवाच – तुम्हारी बात सुनकर हम प्रसन्न और आश्वस्त हुए हैं I तो सुनो ! हम शिशुओं के बचपन को माता-पिता, समाज, शिक्षा के माफिया षड्यंत्रपूर्वक भयानक अजगरों की तरह निगल जाते हैं, हमारा शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक तथा आध्यात्मिक विकास सदा के लिए अवरुद्ध-सा हो जाता है I माता-पिता और घर से लगाव का हमारा सर्वश्रेष्ठ समय आयाओं और मास्टरनियों की डांट फटकार में ही नष्ट हो जाता है I आपको तो मालूम ही है कि आचार्य चाणक्यजी ने चाणक्य नीति [3.8] में लिखा है लालयेत् पञ्च वर्षाणि अर्थात् पांच वर्ष की आयु तक बच्चों को खूब लाड़ करना चाहिए I मां की ममतामयी गोद के स्थान पर आयाओं के आक्रोशित अनुशासन में हमारा बचपन नष्ट हो जाता है और जो थोड़ा-सा शेष रह जाता है, उसे भी माता-पिता जाने क्या-क्या सूचनाएं रटा-रटा कर दिमाग की दही कर डालते हैं I और, फिजियोलॉजी के अनुसार मस्तिष्क सहित सभी अंगों के विकास के लिए हमें किश्तों में 13 से पन्द्रह घण्टों की निद्रा की आवश्यकता होती है, उस उम्र में ट्यूशन, ये सीखो, वो सीखो, पोएम्स, डांस, म्यूजिक I हमारा शैशवकाल भारी-भरकम प्रोग्रामों के बोझ तले नष्ट कर दिया जाता है I जानते हो इन प्ले स्कूलों में भी टेस्ट के नाम पर हमारे नैसर्गिक विकास को बाधित किया जाता है I इतना कहते-कहते ब्रह्मराक्षस के भीतर घुसी हुई करोड़ों शिशुओं की आत्माओं ने ह्रदय विदारक रुदन आरम्भ कर दिया और एकाएक ब्रह्मराक्षस ने मेरे पैर पकड़ लिये और बोला कि हम जो हर दिन आत्मघात की बात सोचते रहते हैं, वह तो अनसुनी ही रह जाती है, कोई माता-पिता, कोई समाचार पत्र, कोई पत्रकार, कोई शिक्षाविद्, कोई साधु, कोई संत, कोई राजनेता हमारी व्यथा का संज्ञान लेते ही नहीं हैं I कोई भी नहीं .... हम कहाँ जाएं I प्लीज, प्लीज हमारे शैशवकाल को तनावों से मुक्ति दिला दीजिए, हम आपके सदा ऋणी रहेंगे I 
मैंने उन्हें आश्वस्ति के भाव से उठाया तो अपने आंसुओं को बरबस रोकते हुए वे बोले- आप अपना बचपन याद कीजिए I आपका तो पाठशाला में प्रवेश ही साढ़े छह वर्ष की उम्र में हुआ था, तब तक कोई पढ़ाई नहीं, कोई ट्यूशन नहीं, न डांस, न पोएम, न म्यूजिक और न ही कोई टेस्ट I आप तो खूब खेले हो, गिल्ली-डंडा, पतंग, सितोलिया, कबड्डी, छिपाछई, बिना उद्देश्य के पूरे गाँव में अपने चचेरे भाई के गले में हाथ डालकर बेफिक्री के साथ भटकना, आसपास के जंगलों में भटकना,  ये सब आपने किया है I पुराने कपड़ों से अपनी ही हाथों से सितोलिये की गेंद बनाना, गटर से गेंद को निकालकर उसे हाथों से निचोड़कर और थोड़ा सूखाकार फिर से वापरना I कुत्तों के साथ खेलना, उनके पिल्लों के खुर गिनना, उनको ठण्ड से बचाने के लिए टाट की व्यवस्था करना, उनके लिए दूध-रोटी की व्यवस्था, मित्रों के साथ ठण्ड में तापने के लिए अलाव के लिए घर से कांच की बोतल में चुपचाप घासलेट लाना, सुबह-शाम मित्रों के साथ गाँव के अनेक मंदिरों में दर्शन करना I मुझे लगता है कि आपकी शैशवावस्था में प्रतिदिन डोपामाइन, ऑक्सीटोसिन, एंडोर्फिन, सेरोटोनिन की वर्षा होती रहती होगी और कॉर्टिसोल भी अपनी सम्यक मात्रा में ही स्रावित होता होगा, तभी तो आप बीस वर्ष की आयु तक कभी भी डॉक्टर के पास नहीं गए, हमें तो हर पन्द्रह दिनों में जाना पड़ता है क्योंकि तनाव के मारे इतना कॉर्टिसोल निकलता है, जिसके कारण रक्त में श्वेत रक्त कोशिकाओं की संख्या कम होती रहती हैं और जब तब रोग प्रतिरोधी तंत्र क्षीण होता रहता है I लम्बी सांस लेते हुए वे बोले, आपने तो अपनी बेटी को पद्मश्री स्व. शालिनी ताई मोघे के हिन्दी माध्यम के स्कूल में भर्ती करवाया था, जहां निवारों से बनी छोटी-छोटी खाट जहां-तहां रखी रहती थे, जहां जब बच्चा चाहे सो जाए I हमभी वैसा ही बचपन चाहते हैं I ब्रह्मराक्षस फिर से फफक-फफक कर रोने लगा I 
उन्हें रोते देख मेरी आँखें भी पनीली हो गई I 
वे फिर बोले –तनावमुक्त बचपन के कारण आपका और आपकी बेटी का जीवन आलोकित ही हुआ है I तनावमुक्त बचपन के कारण आपके भीतर विराजमान प्रतिभा श्रेष्ठता के साथ प्रस्फुटित हुई है I मुझे याद आ रहा है किस तरह आप परीक्षा को एक नियमितचर्या की तरह लेते थे, एक बार आप परीक्षा देकर अपनी दुकान पहुंचे थे तो आपके पिताजी ने पूछा था कि आज परीक्षा से इतनी जल्दी क्यों लौट आए हो I आपने कहा था कि गणित का पेपर था और आठ में से पांच प्रश्न हल करना थे, सभी आते थे इसलिए आधे घंटे में कर दिए और आ गया I तब आपके पिताजी ने जो वाक्य कहा था, वह भी मुझे याद है I उन्होंने कहा था कि अब कभी ऐसा हो कि सभी प्रश्नों के उत्तर आते हों, तो उत्तरपुस्तिका के ऊपर लिख देना कि कोई भी पांच प्रश्न जांचिये और फिर तुमने एक बार ऐसा किया भी था I क्या मस्ती के दिन थे, आपके और आपके मित्रों के I फिर उनकी आँखें और अधिक पनीली हो गईं I 
मैंने उनके हाथों को अपने हाथों में थामा और ढाढस बंधाने का प्रयास किया I 
उन्होंने स्वयं को सम्भालते हुए कहा कि आप ही बताइए, ये हमारे माता-पिता क्या हमारे भीतर की नैसर्गिक प्रतिभा को निखारने का तनावमुक्त वातावरण हमें नहीं दे सकते हैं? क्या आपको नहीं लगता है कि वर्तमान के माता-पिता अपनी महत्वाकांक्षाओं को शिशुओं पर थोपकर मानो उनकी नैसर्गिक प्रतिभाओं की हत्या की सुपारी तो नहीं देते हैं ? मैं बताता हूँ एक रहस्य, इन माता-पिताओं के प्रति हमारे अवचेतन मन में एक शत्रुभाव अंकुरित होकर बढ़ता रहता है क्योंकि इन्होने हमारे बचपन का निर्ममता से गला घोंटा था I हाँ, चेतन मन अवश्य ही इन्हें अपना हितैषी और उपकारी के रूप में स्वीकार कर लेता है, कुछ सांसारिक और सामाजिक दबाव में अन्यथा हमारी इनके प्रति कोई अनुराग नहीं होता है I 
वे फिर बोले- आपको तो अभी भी अपने गाँव से गहरा लगाव है I गाँव जाने की इच्छा सदा ही बनी रहती है, क्योंकि आपकी अच्छी स्मृतियाँ हैं I अपने बचपन के मित्रों से मिलते-बातें करते हो I आपको दो वर्षों तक मां के दूध का सेवन का सौभाग्य प्राप्त हुआ है I i इन सभी कारणों से अभी भी मां-पिता आपके सपनों में आ जाते हैं I हमारे साथ क्या हुआ, नौ माह माता की कोख में अकेले-अकेले बिताए, एक छोटी-सी दुनिया थी, जब जन्मे तो लगा था कि एक विराट जगत में विचरण करने का अवसर मिलेगा I परन्तु चलने और बोलने लायक होते-होते तो झूलाघर, प्ले स्कूल और साथ ही साथ ट्यूशन की काल कोठरी में धकेल दिया जाता है I हमारे मन में माता-पिता के प्रति बदले की भावना उत्पन्न हो जाती है और वे जब हमें भोजन देते हैं तो हम जमकर बदला लेते हैं, खाते ही नहीं हैं, भूख होने के उपरान्त भी बहुत नाटक करते हैं, मोबाइल पर कार्टून देखते हुए भोजन करना I दौड़ा-दौड़ा कर भोजन करना भी इसी बदलें की भावना के रूप हैं I अकेलेपन की बात निकली है तो एक बात और बताता हूँ I मेरा और मेरे भाई का घर में अलग-अलग कक्ष होता है I बचपन में ही माता-पिता और भाइयों के बीच पृथकता के बीज का दृढ़ता के साथ रोपण कर देते हैं I अब बताओ, हम साथ-साथ क्यों रहे, ये जो पृथक कक्ष हैं ना, ये अकेलेपन के सभी दुष्प्रभाव हम पर डालते हैं I आप तो आठ भाई-बहन थे, घर भी विशालकाय था, हरेक को एक अलग कमरा मिल सकता था परन्तु सभी लोग एक बड़े से हाल में प्रतिदिन रात होने के पहले बिस्तरों को फर्श पर बिछाकर एक साथ सोया करते थे I इसलिए अभी तक आपके पिता के तीन दशक पूर्व देहावसान के बाद भी घर का बंटवारा नहीं हुआ है I  
मैंने कहा – जी, मैं यह कह रहा था कि मोबाइल के अधिक उपयोग से तो आपके मस्तिष्क, त्वचा सहित और अन्य अंगों को और भी अधिक नुकसान हो सकता है I 
ब्रह्मराक्षस उवाच- हां, हमें यह बात ज्ञात है I आपको पता ही है कि कई लोग अधिक आक्रोशित होते हैं और परिस्थितियों से हार मान लेते हैं तो दीवार से अपना ही सिर फोड़ लेते हैं, इसे भी कुछ ऐसा ही समझो I 
उजाला होने लगा था, पौ फटने लगी थी, ब्रह्मराक्षस अपनी बात समाप्त करते हुए बोलें – बचपन में जब हमें माता की गोद की अत्यधिक आवश्यकता होती है, माता और शिशु की अनुरागमय बॉन्डिंग के लिए तब माता-पिताओं के पास हमारे लिए समय नहीं होता है, और जब वे वृद्ध हो जाएंगे और हमारी निकटता की उन्हें अत्यधिक आवश्यकता होगी तब हमारे पास इनके लिए समय नहीं रहेगा I हिसाब-किताब बराबर I हाँ, इनके द्वारा हम पर किए गए खर्चों को बैंक का ऋण मानते हुए, हम इन्हें पैसा चुकाते रहेंगे I 
जल्दी-जल्दी में उन्होंने मेरे कन्धे पर हाथ रखा और बोलें – हम अपने माता-पिता के साथ गहरे अनुराग के साथ जुड़ना चाहते हैं, हम उनके साथ शत्रुवत् व्यवहार नहीं करना चाहते हैं, हम माँ की कोख का ऋण सदैव अपने चेतन-अवचेतन मन में धारण करना चाहते हैं, कृपा करके कुछ करिएगा, तुरन्त करिएगा, मोदीजी को अवश्य लिखियेगा और हो सकें तो भेंट कीजिएगा I
मैंने उनसे कहा अवश्य ही परन्तु राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में अनेक विडम्बनाओं का समाधान है I 
वे बोले- आप मूल में ही भूल कर रहे हैं, नई शिक्षा नीति मैंने भी कई बार पढ़ी है I आप बताइए, उसमें कहाँ लिखा है कि माता-पिता अपने बच्चों को दो ढाई वर्ष की उम्र में किसी झूलाघर या प्ले स्कूल में भेजेंगे तो उन्हें दण्डित किया जाएगा I कहाँ लिखा है कि आचार्य चाणक्य के नीति श्लोक का पालन अनिवार्य होगा? 
मैंने अपनी गलती स्वीकार करते हुए उन्हें आश्वस्त किया कि शिशुओं को उनके अधिकार दिलवाने के लिए भरसक प्रयास करूँगा I 
उन्होंने मेरी ओर अत्यधिक अपेक्षा के साथ देखा और वे आँखों में आशा के दीप जलाए हुए देखते ही देखते अन्तर्धान हो गए I

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डॉ मनोहर भंडारी

By News Thikhana

डॉ. मनोहर भंडारी ने शासकीय मेडिकल कॉलेज, इन्दौर में लंबे समय तक अध्यापन कार्य किया है। वे चिकित्सा के अलावा भी विभिन्न विषयों पर निरंतर लिखते रहते है।

Comments

  • Vinod Vairagi, Feb-09-2024

    सम सामयिक और अत्यंत व्यवहारिक पक्ष को बड़े ही रोचक स्वरुप में प्रस्तुत करने पर साधुवाद। यह लेखन कुछ तकनीकी तौर पर हुआ है,तभी तो शब्दो का अनेक जगह सही बोध नहीं हो रहा और कहीं कहीं अनर्थ भी।

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