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बिहार में बिना नीतीश क्यों नहीं चलती सरकार ! कम सीटें फिर भी सीएम क्यों ? 4 वजहों से उनके पास सत्ता की चाबी

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बिहार में बिना नीतीश क्यों नहीं चलती सरकार ! कम सीटें फिर भी सीएम क्यों ? 4 वजहों से उनके पास सत्ता की चाबी

राजनीति//Bihar/Patna :

बिहार में जेडीयू के पास महज 45 विधायक हैं। इसके बावजूद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया गया है। राजद गठबंधन में भी कम सीटों के बावजूद नीतीश मुख्यमंत्री रहे। पिछले 18 सालों से बिहार में नीतीश किंगमेकर नहीं, किंग बनते आ रहे हैं। इस दौरान सिर्फ 9 महीने के लिए जीतन राम मांझी बिहार के सीएम बने थे। आखिर नीतीश के बिना बिहार में सरकार चलाना मुश्किल क्यों हो गया है और कैसे 2 दशकों से उनके हाथ में सत्ता की चाबी है।

कौन है नीतीश के कोर वोटर?
बिहार में नीतीश कुमार का कोर वोट बैंक 16 फीसदी है। उनके वोट शेयर पर उनके पाला बदलने से कोई असर नहीं होता है। वह बिहार में कोइरी, कुर्मी और महादलित समुदाय के सबसे बड़े नेता हैं। इस समुदाय के लोगों के लिए नीतीश कुमार प्राइड इश्यू हैं। यही वजह है कि नीतीश कुमार को साथ रखना बीजेपी और आरजेडी दोनों की मजबूरी है।
कैसे मिली बिहार में इतनी मजबूती
1. जदयू में इकलौते नेता, दूसरे बड़े नेताओं को उभरने से रोका
2003 में नीतीश के साथ मिलकर जॉर्ज फर्नांडिस ने 2003 में नई पार्टी जनता दल यूनाइटेड बनाई। इस वक्त जॉर्ज इस पार्टी के दूसरे सबसे बड़े नेता थे। 2009 आते-आते नीतीश जितना मजबूत हो गए थे, जॉर्ज उतना ही कमजोर हो गए। दोनों नेताओं के बीच खटास पैदा हो गई थी। जो भी नीतीश के फैसले के बीच में आया, सबको उन्होंने अपने रास्ते से हटा दिया। पार्टी के शुरुआती दिनों के नेता दिग्विजय सिंह, शरद यादव को भी नीतीश कुमार ने जॉर्ज की तरह ही साइड लाइन कर दिया। अब जब ललन सिंह जदयू को महागठबंधन के साथ रखना चाहते थे तो नीतीश ने सबसे पहले उन्हें अध्यक्ष पद से हटाया। जदयू में सबसे मजबूत नेता की छवि ने ही उन्हें बिहार की राजनीति में इतना ताकतवर बनाया है।
2. बिहार में मजबूती से सरकार चलाकर साख बनाई
एक मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में विवादों से दूर रहे हैं। इससे प्रदेश में उनकी साख मजबूत हुई है। बीजेपी नेता अरुण जेटली ने 2005 के विधानसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया। उनका यह फैसला सटीक बैठा। लालू यादव के शासन के बाद 2005 और 2010 के बीच नीतीश कुमार ने बिहार में बिजली, सड़क और अपराध रोकने पर अच्छा काम किया। इससे उनकी छवि मजबूत हुई। लोग उन्हें ‘सुशासन बाबू’ कहने लगे। इस तरह नीतीश कुमार प्रदेश में पसंदीदा सीएम बनकर उभरे।
3. राजद एम-वाई समीकरण में सिमटी तो जेडीयू ने पूरे पिछड़ों को साधा
बिहार की राजनीति में लालू यादव की पार्टी राजद को एम-वाई यानी मुस्लिम-यादव समीकरण वाली पार्टी के रूप में जाना जाता है। 1990 के बाद से ही राजद के बड़े नेता अपने मूल वोट बैंक को साधने में ही लगे रहे। इसकी वजह से दूसरी जातियों का वोट राजद को न के बराबर मिलता रहा।
इसी समय 30 फीसदी से ज्यादा पिछड़े समुदाय और एससी को साधने की कोशिश नीतीश कुमार और उनकी पार्टी ने की। उन्हें 2010 के विधानसभा चुनाव में काफी सफलता भी मिली। 
4. बिहार में खुद को एक विकासवादी मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया
बीजेपी के साथ गठबंधन में रहकर नीतीश कुमार पहले से ज्यादा मजबूत नेता बनकर उभरे। इस गठबंधन के पक्ष में एक खास बात यह है कि बीजेपी का वोटर बेस सवर्ण जाति, गैर-यादव अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (एमबीसी) है। वहीं, नीतीश की पार्टी का ओबीसी, गैर-यादव के साथ-साथ लव-कुश (कुर्मी-कोइरी), महादलित मुख्य वोट बैंक है। यही वजह है कि गठबंधन में होने पर इन जातियों के वोट दोनों दलों को थोक में मिलते हैं।
नीतीश ने बिहार में खुद को एक विकासवादी मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में पेश किया है। वहीं, बीजेपी में नरेंद्र मोदी की इमेज भी विकास पुरुष की है। लंबे समय तक साथ रहने के कारण भाजपा और जेडीयू के विधायक आपस में सामंजस्य के साथ काम करते नजर आते रहे हैं। बीजेपी के साथ रहने से नीतीश की पार्टी को फायदा ही मिला है।

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Jyoti Bala

By News Thikhana

Senior Sub Editor

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