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क्या पीड़ित व्यवस्था को डॉ. विक्रम यथास्थितिवाद और आत्मविस्मरण नामक कैंसर से मुक्त कर पायेगा-1

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क्या पीड़ित व्यवस्था को डॉ. विक्रम यथास्थितिवाद और आत्मविस्मरण नामक कैंसर से मुक्त कर पायेगा-1

लेख//Madhya Pradesh/Indore :

विक्रमादित्य मूलतः भारतीय ज्ञान परम्परा पर पूर्ण विश्वास करने वाला अत्यधिक होनहार छात्र था I प्रतिदिन मन्दिर जाना, वेद-पुराण, उपनिषद, श्रीरामचरितमानस और श्रीमद्भागवत गीता पढ़ना उसका नित्यकर्म था I उसका प्रवेश देश के सर्वश्रेष्ठ मेडिकल कॉलेज में हुआ और उसने एम.बी.बी.एस. करने के बाद एम.डी. और एम.एस. भी कर लिया, उस काल में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की तरह मल्टी स्पेशिएलिटी मान्य हुआ करता था, मुझे स्मरण है कि मेडिकल कॉलेज के डॉ. एस.के. मुखर्जी जैसे अनेक शिक्षक एकाधिक विषयों को अधिकारपूर्वक पढ़ाया करते थे I

अपनी पढ़ाई पूरी करते-करते डॉ. विक्रमादित्य के अवचेतन मस्तिष्क में जो स्व संस्कृति अभिमान डिवाइस [सेल्फ कल्चर प्राइड डिवाइस] थी, उस पर मैकालेवादी जिद्दी धुल की मोटी परतें चढ़ चुकी थी और वह भारतीय ज्ञान परम्पराओं को अंधविश्वास और बकवास मानने लगा था और उसने शास्त्रों का वाचन तथा मन्दिर जाना भी छोड़ दिया था I

अस्तु, वह देश ही नहीं अपितु पूरे विश्व में एक श्रेष्ठ और कुशल शल्य चिकित्सक तथा फिजिशियन के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुका था I उसे रॉयल आस्ट्रेलियन कॉलेज ऑफ सर्जन्स, मेलबर्न ने सहर्ष और ससम्मान आमंत्रित कर फेलोशिप भी प्रदान की थी, उस कॉलेज के मुख्य द्वार पर महर्षि सुश्रूत की विशाल प्रतिमा लगी थी और नीचे लिखा था कि “फादर ऑफ सर्जरी”, उस विशाल प्रतिमा को देखने के उपरान्त भी विक्रम के भीतर की स्व संस्कृति अभिमान डिवाइस [एस.सी. पी.डी.] में कोई हलचल नहीं हो सकी I

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क्या पीड़ित व्यवस्था को डॉ. विक्रम यथास्थितिवाद और आत्मविस्मरण नामक कैंसर से मुक्त कर पायेगा-2 (newsthikana.com)

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एक दिन विक्रम सदैव की तरह शाम को गूगल विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में कुछ पढ़ रहा था तो उसने एक शोध आलेख का शीर्षक देखा “फिजिशियन्स एश्योरेंस रिड्युजेज पेशेंट्स सिम्पटम्स इन अमेरिकन एडल्ट्स”, जिज्ञासावश या यूँ कहें कि महाकालेश्वर की प्रेरणा से उसने कुछ और पढ़ा तो उसे न्यूरोप्लास्टिसिटी के विषय में पढने को मिला, जिसमें एक न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. पॉल बैच रीटा के पिता श्री पेड्रो बैच रीटा का उल्लेख था, जो असाध्य पक्षाघात से ग्रस्त थे, परन्तु आश्वासन चिकित्सा से पूर्णरूपेण स्वस्थ हो गए थे I फिर कोशिका जीव विज्ञानी डॉ. ब्रूस लिप्टन के सकारात्मक सोच या भारतीय संकल्प के शोध का पता चला I उसी दिन उसने प्रसिद्ध फिजिशियन डॉ. आइजेक जेनिंग्स के शोध के विषय में पढ़ा, जिसके तहत उसने बीस वर्षों तक अपने रोगियों को उनके विश्वास और मानव शरीर की नैसर्गिक क्षमता के आधार पर बिना औषधि मात्र प्लेसेबो से सफलतापूर्वक रोग मुक्त किया था I उसी समय उसने प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ. नॉर्मन डॉज, एम.डी. की दो पुस्तकों की संक्षेपिका यानी समरी पढने का भी अवसर मिला, उन पुस्तकों के नाम थे, “द ब्रेन  देट चेंजेज इटसेल्फ” और “द ब्रेन्स वे ऑफ हीलिंग”, जिसमें उन्होंने लिखा था कि मानव मस्तिष्क हार्ड वायर्ड मशीन नहीं है I अभी वह इन झटकों से मुक्त हुआ ही नहीं था कि उसकी दृष्टि के सामने से मार्कस इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटिव हेल्थ के डायरेक्टर और जेफरसन यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के फिजिशियन डॉ. एंड्रयू न्यूबर्ग, एम.डी. और उनके साथी डॉ. मार्क राबर्ट वाल्डमैन की पुस्तक “हाउ गॉड चेंजेज योर ब्रेन”, पुस्तक आ गई, जिसमें लिखा था कि भगवान में विश्वास करने वाले व्यक्तियों के मस्तिष्क में प्रार्थना से रचनात्मक परिवर्तन होते हैं और व्यक्ति स्वस्थ होने लगता है I

लेख का अगला अंक सोमवार, 26 फरवरी 2024 को...

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डॉ मनोहर भंडारी

By News Thikhana

डॉ. मनोहर भंडारी ने शासकीय मेडिकल कॉलेज, इन्दौर में लंबे समय तक अध्यापन कार्य किया है। वे चिकित्सा के अलावा भी विभिन्न विषयों पर निरंतर लिखते रहते है।

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