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क्या पीड़ित व्यवस्था को डॉ. विक्रम यथास्थितिवाद और आत्मविस्मरण नामक कैंसर से मुक्त कर पायेगा-3

लेख

क्या पीड़ित व्यवस्था को डॉ. विक्रम यथास्थितिवाद और आत्मविस्मरण नामक कैंसर से मुक्त कर पायेगा-3

लेख//Madhya Pradesh/Indore :

...उसे यह भी लगा कि ईश्वरीय आस्था और विश्वास से भरपूर देश में ही आध्यात्म और स्वास्थ्य के सम्बन्धों को चिकित्सा शिक्षा के पाठ्यक्रम से अछूता और दूर रखा गया है I वह सोचने लगा, काश ! मैंने अमेरिका के किसी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया होता

और अब आगे लेख की अंतिम और तीसरी किश्त

...वह आत्मग्लानि से भर गया और उसकी ग्लानि चरमोत्कर्ष पर जा पहुँची साथ ही विक्रम के मन-मस्तिष्क में उठ रहे द्वंद्व, अंतर्द्वंद्व, झंझावातों ने विक्रम को अत्यन्त विकल, विचलित और उद्विग्न कर दिया तथा उसे गहरा पश्चाताप होने लगा कि आखिर उसने अपने आराध्य भगवान महाकाल से कई वर्षों से क्यों मुंह मोड़ रखा था I वह सोच रहा था कि क्या वह अपनी संस्कृति का हत्यारा है, पश्चाताप के चलते उसके मन में आत्मघात के विचार भी आने लगे I 

 

वह इसी उहापेह और असमंजस से स्वयं को निकालने के प्रयास कर रहा था कि उसके मन में विचार आया कि भगवान शिव तो आशुतोष हैं, वे मुझे अवश्य ही क्षमा करेंगे I इसी विचार को मन में धारण कर वह नंगे पैरों महाकाल मन्दिर की ओर दौड़ पड़ा I गर्भगृह में प्रवेश करते ही उसने शिवलिंग को अपनी बाहों में जकड लिया और बोला, त्राहिमाम-पाहिमाम, हे प्रभो प्रकट होइए, मेरे मन को शान्ति दीजिए, मेरा मस्तिष्क आत्म ग्लानि से फट जाएगा, प्रभो आइए-प्रभो प्लीज आ जाइए I

अचानक भगवान त्रिशूल, डमरू आदि के साथ प्रकट हुए और विक्रम के सिर पर हाथ फेरते हुए बोलें ॐ शान्ति, शान्ति, शान्ति:, विक्रम का मन अचानक गहरी शान्ति में खो गया I उसे ऐसा अंतर्ज्ञान हुआ कि वास्तव में शान्ति शब्द की रचना ही इसलिए की गई है क्योंकि ये शब्द बारम्बार दोहराया जाए तो तन-मन और मस्तिष्क में शान्ति का अवतरण होने लगता है, अस्तु, वह भगवान के चरणों में सिर रखकर रोने लगा I

भगवान ने उसे उठाया और बोले- वत्स विक्रम ! मैं कितने वर्षों से तेरी प्रतीक्षा कर रहा था, परन्तु तू तो मैकाले के चंगुल में ऐसा फंसा कि मुझे भूल ही गया I तूने तो मन्दिर के सामने से भी आना-जाना बन्द कर दिया था, मुझे लगा कि अपने भटके हुए भक्त को सत्यमार्ग पर मुझे ही लाना है और मेरी प्रेरणा से ही तू गूगल विश्वविद्यालय के वाचनालय में गया और मेरी ही योजना से तेरी आँखों के समक्ष वे ही पुस्तकें, शोध और सन्दर्भ आते गए, जिनसे तेरे स्व संस्कृति अभिमान यंत्र के ऊपर पड़ी धुल की परतें बिखर सकें I

लेख के पहले और दूसरे अंक यहां पढ़ें..

क्या पीड़ित व्यवस्था को डॉ. विक्रम यथास्थितिवाद और आत्मविस्मरण नामक कैंसर से मुक्त कर पायेगा-1 (newsthikana.com)

क्या पीड़ित व्यवस्था को डॉ. विक्रम यथास्थितिवाद और आत्मविस्मरण नामक कैंसर से मुक्त कर पायेगा-2 (newsthikana.com)

विक्रम बोला-क्या सच में आप मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे?

भगवान-हाँ, वत्स ! भगवान तो हर समय विकलता से अपने भक्त की प्रतीक्षा करते रहते हैं, यही तो आत्मा और परमात्मा के पारस्परिक स्नेह का अटूट बंधन है I सुनो विक्रम ! आज मैंने तुम्हे विशेष प्रयोजन से आमंत्रित किया है I

विक्रम – भगवन ! आप आदेश दीजिए, मुझे क्या करना है ?

भगवान ने अपने त्रिशूल से एक छोटी-सी छुरी उत्पन्न की और उसे विक्रम को देते हुए बोले -विक्रम ! यह एक तीव्र शल्य उपकरण है I

बड़ी ही उतावली के साथ विक्रम ने उस छुरी को मस्तक से लगाया और बोला-भगवान ! इसका क्या करना है?

भगवान बोले- विक्रम ! वर्तमान में भारत में मेरा परम भक्त नरेन्द्र प्रधान सेवक के रूप में कार्य कर रहा है I वह भारतीय ज्ञान परम्पराओं की वैज्ञानिक प्राण प्रतिष्ठा के लिए प्राणपण से अनथक प्रयास कर रहा है, चौबीसों घण्टें उसके मन-मस्तिष्क में सनातन धर्म के तहत वसुधैव कुटुम्बकम् का लक्ष्य रहता है I परन्तु .........

विक्रम –भगवान ! परन्तु क्या ?

भगवान बोले – विक्रम ! नरेन्द्र के कुछ मंत्रियों-नेताओं को छोड़कर देशभर में उसके दल के अधिकांश केन्द्रीय और राज्य सरकारों के मंत्री, सांसद-विधायक, नेता और अनुयायी “यथास्थितिवादी तथा भारतीय ज्ञान परम्पराओं को अंधविश्वास मानने वाली व्यवस्था” के मार्गदर्शन और अधीनस्थ काम करते रहने को ही अपना साहस, पराक्रम तथा सुराज समझ रहे हैं, उनके पास उस व्यवस्था पर अपना आधिपत्य स्थापित करने का न तो साहस है और न ही स्पष्ट विचार शक्ति है I वास्तव में देश की व्यवस्था को “यथास्थितिवाद” नाम के दुर्दान्त कैंसर ने जकड़ रखा है और साथ-साथ व्यवस्था को एक अन्य प्रकार की मेलिग्नेन्ट ग्रोथ ने भी अपना शिकार बना लिया है, जिसका नाम है, “आत्म विस्मरण I इस कारण वर्तमान व्यवस्था को यह विश्वास और स्मरण होता ही नहीं है कि भगवान श्रीकृष्ण और चाणक्य ने भी राष्ट्रहित में पुरातन व्यवस्थाओं को उखाड़ फेंका था I इसलिए तुम्हें बेताल के सहयोग से व्यवस्था के मन-मस्तिष्क में प्रवेश कर इस छुरी से दोनों कैंसरस ट्यूमर को निकाल कर फेंकना है I इसके अतिरिक्त तुम्हें भारतीय ज्ञान परम्पराओं और लोकोक्तियों पर आधारित दर्जनों वैज्ञानिक अनुसंधान करना है ताकि भारतीय ज्ञान परम्पराओं की विश्व भर में प्रामाणिक स्वीकार्यता हो सकें और भारत को अनेक अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हो सकें I मैं चाहता हूँ कि नरेन्द्र मोदी पूरे विश्व को स्वस्थ, सुखी, समृद्ध, समर्थ और सन्तुष्ट बनाने के अपने स्वप्न को शीघ्र साकार कर सकें I सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया और वसुधैव कुटुम्बकम् का उसका सपना मैं शीघ्र पूरा होते देखना चाहता हूँ I

विक्रम – भगवान ! मैं आपकी आज्ञा और आशीर्वाद से ये पराक्रम अवश्य ही करूंगा I

और भगवान ने तथास्तु कहा और विक्रम को महाकाल के गर्भगृह में अकेला छोड़ अन्तर्धान हो गए I    

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डॉ मनोहर भंडारी

By News Thikhana

डॉ. मनोहर भंडारी ने शासकीय मेडिकल कॉलेज, इन्दौर में लंबे समय तक अध्यापन कार्य किया है। वे चिकित्सा के अलावा भी विभिन्न विषयों पर निरंतर लिखते रहते है।

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